लिखा है मैंने ख़ास आपके लिए
लिखा है बस आपके लिए
ये बचपन ये शौक़ ये आवारपं
कुछ ही पल के है
मुट्ठी में क़ैद करके
मोती की तरह पीरोलिजिये
बड़प्पन कब आके बोले – ‘चल अब बहुत देर हो गयी है।’
बिछड़ जाएगा वो संसार बनाया था जो इटमेनन से
नजाने कब आके बोले ‘चल अब देर हो गयी है।’
वो दोस्त वो राते वो खिलखिलाहट
जो देर समझके बैठे थे
देख तेरा साया अब उनके भीतर खड़ा है
बोल रहा है ‘चल अब देर हो गयी है।’
मैं बैठा हु यहाँ इस सोच में
कहाँ गए वो दिन वो मुस्कराहट
फूलों सी जिस में, मीठी ख़ुशबु थी समायी
वो भी क्या समय था
वो भी क्या दिन थे
था कुछ अलग, कुछ तो ख़ास था,
अब वो दिन मैं कहाँ ढूँढऊ
अब बस आकर यूँ बोल गया
‘चल अब देर हो गयी है।’
वो दूर तेरी मंज़िल है
जिसकी परछाईं तेरे पीछे है खादी
चल अब उसको गले लगा
सीना तान के बोल,
“बता अब भी देर कहा हुई है?”
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